रचना क्र. 288
जागिये रघुनाथ कुँवर
श्री तुलसीदास · null
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जागिये रघुनाथ कुँवर पंछी बन बोले ॥धृ॥
चंद्रकिरण सितल भई,
चकई पिया मिलन गई ।
त्रिविधमंद चलत पवन,
पल्लवद्रुम डोले ॥१॥
प्रातभानुप्रगट भयो,
रजनी को तिमिर गयो ।
भृंग करत गुंजगान,
कमलन दल खोले ॥२॥
ब्रह्मादिक धरत ध्यान,
सुरवरमुनि करत गान ।
जागन की बेर भई,
नयन पलक खोले ॥३॥
तुलसिदास अति आनंद,
निरखिकै मुखारविंद ।
दानन को देत दान,
भूषन बहु मोले ॥४॥
