रचना क्र. 6
हरि के भजन बिना सुख नाही
श्री ब्रह्मानंद (पुष्कर)
हरि के भजन बिना सुख नाही,
नर क्यों बिरथा भटकाई रे ॥धृ॥
काशी, गया , द्वारका जावे,
चार धाम तीरथ फिर आवे,
मन की मैल न जाई रे ॥१॥
छाप तिलक बहु भांति लगाये,
सिरपर जटा विभूति रमाये,
हिरदय शांति न आई रे ॥२॥
वेद पुराण पढे बहु भारी ,
खंडन मंडन उमर गुजारी,
बिरथा लोक बडाई रे ॥३॥
चार दिवस जग बीच निवासा,
ब्रह्मानंद छोड सब आशा,
प्रभु चरणन चित लाई रे ॥४॥
