रचना क्र. 57
भजन बिन बावरे
श्री कबीर · null
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भजन बिन बावरे,
तैने हीरा सो जनम गँवायौ ॥धृ॥
कभी न आयौ संत शरण में,
ना तै हरि गुण गायौ ।
बह बह मरौ बैल की नाई,
सोय रह्यौ उठि खायौ ॥१॥
ये संसार हाट बनिये की,
सब जग सौदा लायौ ।
चातुर माल चौगुना कीन्हौ,
मूरख मूल गँवायौ ॥२॥
यह संसार फूल सेमर का,
सूआ देख लुभायौ ।
मारी चोंच रुई निकसाई,
मूंडी धुनि पछितायौ ॥३॥
ये संसार माया कौ लोभी,
ममता महल चिनायौ ।
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई संतो,
हात कछू नहीं आयौ ॥४॥
