रचना क्र. 42
मैं तो तेरे भजन भरोसे अबिनासी
श्री मीराबाई · null
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मैं तो तेरे भजन भरोसे अबिनासी ॥धृ॥
तीरथ बरतते कछु नहीं कीनो ।
बन फिरे है उदासी ॥१॥
जंतर मंतर कछु नहीं जानूं ।
वेद पढो नहीं कासी ॥२॥
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर ।
भई चरण की दासी ॥३॥
रचना क्र. 42
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मैं तो तेरे भजन भरोसे अबिनासी ॥धृ॥
तीरथ बरतते कछु नहीं कीनो ।
बन फिरे है उदासी ॥१॥
जंतर मंतर कछु नहीं जानूं ।
वेद पढो नहीं कासी ॥२॥
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर ।
भई चरण की दासी ॥३॥