रचना क्र. 31
हरिभजन करे तो सुख पायगा रे
श्री ब्रह्मानंद (पुष्कर) · null
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हरिभजन करे तो सुख पायगा रे ।
नहिं तो जनम जनम भटकायगा रे ॥धृ॥
भवसागर में नीर अपारा ।
हरि का नाम जहाज सुखारा ।
जपे जो निश्चय धार पार लगायगा रे ॥१॥
मायाजाल बडा है भारी ।
निकलन की नहिं दूजी बारी ।
मानुषतन जब छूटे फिर पछतायगा रे ॥२॥
चार दिवस का जग में डेरा ।
क्या करता है मेरा मेरा ।
खाली आया था फिर खाली जायगा रे ॥३॥
सकल जगत का कर्ता स्वामी ।
घट घट का प्रभु अंतर्यामी ।
‘ब्रह्मानंद’ सुमर नरदुख मिटायगा रे ॥४॥
