रचना क्र. 426
कृष्ण घर नंदके आये
श्री ब्रह्मानंद (पुष्कर)
कृष्ण घर नंदके आये सितारा हो तो ऐसा हो ।
करें सब प्रेमसे दर्शन दुलारा हो तो ऐसा हो ॥१॥
बकासुरको मसल डारा पूतना जानसे मारी ।
कंसको केशसे खेंचा खिलारा हो तो ऐसा हो ॥२॥
कूद पानीके अंदरसे नागको नाथकर लाये ।
चरण फणफणपे धर करके नचारा हो तो ऐसा हो ॥३॥
तीर जमुनाके जाकरके बजाई बांसुरी मोहन ।
चली घर छोड ब्रजनारी पियारा हो तो ऐसा हो ॥४॥
रचाई रास कुंजनमें मनोहर रूप बन करके ।
देवदर्शनको चलआये दिदारा हो तो ऐसा हो ॥५॥
गये जब छोड गोकुलको नही फिर लौटकर आये ।
सखी रोती रही बनमें किनारा हो तो ऐसा हो ॥६॥
पुरी द्वारावती जाकर महल सोनेके बनवाये ।
हजारों रानियां ब्याही पसारा हो तो ऐसा हो ॥७॥
कुरुपांडव लडे रणमें जीत अर्जुनकी करवाई ।
बचाई लाज द्रुपदीकी सहारा हो तो ऐसा हो ॥८॥
उतारा भार भूमीका सिधारे धाम अपनेको ।
वो ब्रह्मानंद दुनियांसे नियारा हो तो ऐसा हो ॥९॥
