रचना क्र. 424
अपनेको आप भूलके
श्री ब्रह्मानंद (पुष्कर) · null
null
अपनेको आप भूलके हैरान होगया ।
मायाके जालमें फसा विरान होगया ॥धृ॥
जडदेहको अपना स्वरूप मान मन लिया ।
दिनरात खान पान कामकाज दिल दिया ।
पानीमें मिलके दूध एकजान होगया ॥१॥
विषयोंको देखदेखके लालचमें आरहा ।
दीपकमें ज्यो पतंग जायके समारहा ।
बिना बिचारके सदा नादान होगया॥२॥
कर पुण्य पाप स्वर्ग नरक भोगता फिरे ।
तृष्णाकी डोरसे बंधा सदा जनम धरे ।
पीकरके मोहकी सुरा बेभान हो गया ॥३॥
सतसंगमें जाकर सदा दिलमें बिचारले ।
बदनमें अपने आप रूपको निहारले ।
ब्रह्मानंद मिले मोक्ष जबी ज्ञान होगया ॥४॥
