रचना क्र. 340
राम न जाने नर
श्री रामदास स्वामी
राम न जाने नर,
जिया तो क्या जी ? ॥धृ॥
धनदौलत सब, माल खजीना ।
और मुलुक सर, किया तो क्या जी ?॥१॥
गंगा गोमति, रेवा तापी ।
और बनारस, नाह्या तो क्या जी ?॥२॥
गोकुल मथुरा, मधुबन द्वारका ।
और अयोध्या कर, आया तो क्या जी ?॥३॥
दरवेश शवडा, जंगम, जोगी ।
और कानफाडी, हुवा तो क्या जी ? ॥४॥
आत्मज्ञान की, खबर न जाने ।
और ध्यान न बक, हुवा तो क्या जी ? ॥५॥
वेदपुरान की, चर्चा घनि है ।
और शास्तर पढ, आया तो क्या जी ? ॥६॥
रामदास प्रभु, आत्म रघुवीर ।
इस नयन नहिं, छाया तो क्या जी ? ॥७॥
