रचना क्र. 272
मैं तो गुलाम गुरु का
श्री पेठेकाका · null
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मैं तो गुलाम गुरु का, गुरुपद का ! ॥धृ॥
देखे परखे अपने करतब ।
मनबुद्धि के मैंने जबजब ।
तब से गुुरु की शरण गया हूँ ।
मार्ग चलें अब हित का...
हित का...॥१॥
मुझे न कोई इच्छा अपनी ।
अभी राह ना मंझिल अपनी ।
मुझसे गुरु करवाना चाहे ।
कर्म वही अब खुद का...
खुद का...॥२॥
करता हूँ निज कर्म पुराना ।
क्या बदला है कहीं ज़माना ।
बाहर से तो ‘दीन’ वही है ।
अन्दर कण कण गुरु का...
गुरु का...॥३॥
