रचना क्र. 260
दीन कहे मोरे प्रभु घर आये
श्री पेठेकाका · null
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दीन कहे मोरे प्रभु घर आये॥धृ॥
मुझको भटकत देखत निशिदिन ।
मंंदिर मस्जिद जन जन कानन ।
घन करूणा का प्रभु बरसायेे ॥१॥
ग्रंथ विवाद विचार विशोधन ।
देखत मुझको ढूँढत अनुदिन।
खुद अपनाही रूप दिखायेे ॥२॥
अब ना जाए दीन कहीं भी ।
ना ढूँढे अब प्रभु बाहर भी ।
अब चाहे तब दरशन पाये ॥३॥
