रचना क्र. 184
जाग मुसाफिर देख जरा
श्री ब्रह्मानंद, पुष्कर
जाग मुसाफिर देख जरा ,
वो तो कूच की नौबत बाज रही ॥धृ॥
सोवत सोवत बीत गयी ,
सब रात तुझे परभात भई ।
सब संग के साथि तो लाद गये ,
तेरे नैनन नींद बिराज रही ॥१॥
कोई आज गया, कोई काल गया,
कोई जावन काज तियार खडा ।
नहिं कायम कोई मुकाम यहाँ
चिरकाल से येहि रिवाज रही ॥२॥
इस देश में चोर चकोर घने,
निज माल की राख संभाल सदा ।
बहुते हुशियार लुटाय गये,
नहिं कोई की साबुत लाज रही ॥३॥
अब तो तज आलस को मन से
कर संग समान तियार सभी ।
‘ब्रह्मानंद’ न देर लगाय जरा,
बिजली सिर ऊपर गाज रही ॥४॥
