रचना क्र. 126
नाम लिया हरि का जिसने
श्री ब्रह्मानंद (पुष्कर)
नाम लिया हरि का जिसने ,
तिन और का नाम लिया न लिया ॥धृ॥
पशुपक्षी सभी जगजीवन को,
जिसने अपने सम जान सदा ।
सबका परिपालन नित्य किया,
तिन विप्रन दान दिया न दिया ॥१॥
जिनके घर में प्रभुकी चर्चा,
नित होवत है दिनरात सदा ।
सतसंग कथामृत पान किया,
तिन तिरथ नीर पिया न पिया ॥२॥
जिन काम किये परमारथ के,
तन से, मन से, धन से, कर से ।
जग अंदर कीरत छाय रही,
दिन चार विशेष जिया न जिया ॥३॥
गुरु के उपदेश समागम से,
जिसने अपने घट भीतर में ।
‘ब्रह्मानंद’ स्वरूप को जान लिया,
तिन साधन योग किया न किया ॥४॥
