रचना क्र. 118
गुरुकृपांजन पायो रे भाई
श्री कबीर · null
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गुरुकृपांजन पायो रे भाई ।
रामबिना कछु देखत नाही ॥१॥
अंदर राम बाहिर राम ।
जहाँ देखे वहाँ पूरनकाम ॥२॥
जागत राम सोवत राम ।
सपनों में देखत राजा ही राम ॥३॥
कहत कबीरा अनुभव निका ।
जहाँ देखे वहाँ रामसरिखा ॥४॥
