रचना क्र. 114
गुरुबिन कौन बतावे वाट
श्री कबीर · null
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गुरुबिन कौन बतावे वाट
बडा बिकट यमघाट ॥धृ॥
भ्रांति की बडी नदियाँ बीच में ।
अहंकार की लाट ॥१॥
मदमत्सर की धार बरसत है ।
माया पवन घनदाट ॥२॥
कामक्रोध दो पर्वत ठाडे ।
लोभ चोर सांगात ॥३॥
कहत कबीरा सुन मेरे गुनिया ।
क्यों करना बोभाट ॥४॥
