रचना क्र. 113
भजो रे भैया राम गोविंद हरि
श्री कबीर · null
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भजो रे भैया राम गोविंद हरि ॥धृ॥
जपतपसाधन कछु नहीं लागत ।
खरचत नहीं गठरी ॥१॥
संतति संपति सुख के कारन ।
ज्यासे भूल परी ॥२॥
रामनाम का सुमिरन कर ले ।
सिर पे मौत खडी ॥३॥
कहत कबीर ज्या मुख राम नाहीं ।
वो मुख धूल परी ॥४॥
