रचना क्र. 84
इस तन धन की कौन बढाई
श्री कबीर · null
null
इस तन धन की कौन बढाई ।
देखत नयनों में मिट्टी मिलाई ॥धृ॥
अपने खातिर महल बनाया ।
आपही जाकर जंगल सोया ॥१॥
हड्डी जले जैसे लकडी की मोली ।
बाल जले जैसे घास की पोली ॥२॥
कहत कबीरा सुन मेरे गुनिया ।
आप मुवे पीछे डुब गई दुनिया ॥३॥
