रचना क्र. 49
अगर है ज्ञान को पाना
श्री ब्रह्मानंद (पुष्कर) · null
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अगर है ज्ञान को पाना ,
तो गुरु की जा शरण भाई ॥धृ॥
जटा सिर पर रखाने से,
भसम तन में रमाने से ।
सदा फलमूल खाने से,
कभी नहिं मुक्ति को पाई ॥१॥
बने मूरत पुजारी है,
तीरथ यात्रा पियारी है ।
करें ब्रत नेम भारी है,
भरम मन का मिटे नाहीं ॥२॥
कोटि सूरज शशि तारा,
करें प्रकाश मिल सारा ।
बिना गुरु घोर अंधियारा,
न प्रभु का रूप दरसाई ॥३॥
ईश सम जान गुरुदेवा,
लगा तनमन करो सेवा ।
‘ब्रह्मानंद’ मोक्ष पदमेवा,
मिले भवबंध कट जाई ॥४॥
