रचना क्र. 369
सोचो रे मनुवा
श्री पेठेकाका · null
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सोचो रे मनुवा, निजहित की कल्पना ।
साधो रे मनुवा, चैतन्योपासना ॥धृ॥
सगुण जगत में जीवरूप हो ।
देशकाल में बद्ध बने हो ।
उपासना तब गुणमय की हो ।
निर्गुण की याद हो ॥१॥
चेतन जड जग भिन्न नहीं है ।
वेष सगुण निर्गुण अन्दर है ।
सूक्ष्म खोजना काम तुझे है ।
गुरुवरवचन स्मरो ॥२॥
दिनदिन कर्म करें आजीवन ।
कभी न इसमें भूले भगवन् ।
भजन साधु सत्संग सुमीरन ।
वृत्यंतर लक्ष्य हो ॥३॥
छोड अमिट माँगे तनधन की ।
अहंकार है जड भवजल की ।
तरने मन ले साथ गुरू की ।
चैतन्यब्रह्म की ॥४॥
